शनिवार, 5 जून 2010

हाँ वह परमेश्वर का प्रतीक थी....-देव

एक छोटी बच्ची....
अठखेलियाँ कर रही थी...
खेल रही थी
एक गुब्बारे से
कभी ऊपर उछाल देती
कभी उसे उठाने दौड़ पड़ती
कभी पापा को खींचती
कभी चाचू को खींचती....
कभी जोर जोर से चिल्लाती
तो कभी एकदम चुप हो जाती....
उसके खेल में कितनी सजीवता थी...
उसके प्रेम में कितनी आत्मीयता थी....
वह विधाता का रूप थी....
हाँ वह परमेश्वर का प्रतीक थी....
क्योंकि वह छोटी बच्ची थी...
वह प्यारी सी बच्ची थी....
देव

9 टिप्‍पणियां:

महफूज़ अली ने कहा…

यह कविता दिल को छू गई.... बहुत खूबसूरती से लिखा है.... सुंदर भाव.....

महफूज़ अली ने कहा…

यह कविता दिल को छू गई.... बहुत खूबसूरती से लिखा है.... सुंदर भाव.....

शिवम् मिश्रा ने कहा…

निदा फ़ाज़ली साहब ने क्या खूब कहा है ...................
" घर से मज्जिद है बहुत दूर चलो यूँ कर लें ...............किसी रोते हुए बच्चे को हंसाया जाए |"
बेहद उम्दा रचना, देव बाबु |

Udan Tashtari ने कहा…

बहुत सच्ची रचना, देव बाबा!! बढ़िया रची!

संजय भास्कर ने कहा…

किस खूबसूरती से लिखा है आपने। मुँह से वाह निकल गया पढते ही।

M VERMA ने कहा…

बहुत सुन्दर

राम त्यागी ने कहा…

jai ho देव बाबा

वन्दना ने कहा…

बहुत खूब्…………कल के चर्चा मच पर आपकी पोस्ट होगी।

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

बहुत खूबसूरत भाव ..