शुक्रवार, 8 दिसंबर 2017

फोन बिन सब सून...

अगर आपका फोन खराब हो जाए तब क्या हो? आज कल की तकनीक पसंद दुनिया मे फोन बिन सब सून.. फोन है तक इंसान की सांसें हैं, फोन नहीं, नेटवर्क नही तो जिंदगी भी नहीं.... ऐसा ही है न?

कल शाम मेरा गूगल पिक्सेल नए ऑपरेटिंग सिस्टम 8.1 एंड्राइड इंस्टॉल करते समय वीरगति को प्राप्त हो गया.... बिचारा मेरे हाथ मे कब तक झेलता सो निबट लिया... इस वर्चुअल से संसार में बिना फोन कितना सुकून है क्या कहूँ... सुबह सुबह पाँच बजे ऑफ-शोर की कॉल थी मग़र फोन ही नहीं तो क्या कॉल? आराम से सोया.. रात में भी जल्दी नींद आ गयी क्योंकि न फेसबुक और न ट्विटर... और न ही मैच की टेंशन और न ही इसकी कि आज सुरजेवाला और सिब्बल ने क्या बकवास की और राहुल गांधी ने क्या नया कॉमेडी किया.... और न ही इस बात से कि मोदी ने चाय वाला बनकर कैसे जेबलूटली!! बवाल है यह फोन.. बिन फोन ज़िन्दगी में कितना सुकून है... 

सुबह ऑफिस के रास्ते में बीवी को कॉल करने की ज़रूरत ही नहीं पड़ी, ऊपर से मोबाइल की कैद से खाली हुए हाथों ने कल की बर्फबारी के पहले की ठंड में गर्म कॉफ़ी लेकर चलने का आनंद लिया... मोबाइल न होने से जेब हल्की थी तो कई बार ऐसा आभास ज़रूर हुआ कि किसी ने जेब तो न काट ली!!  आज न चलते हुए रास्ते में किसी को काल करने की जरूरत पड़ी और न ही आफिस में भयंकर व्यस्तता के बीच "क्या कर रहे हो" जैसे सवालों का उत्तर देने की स्थिति आई... और तो और बिना फोन स्क्रोल किये हुए राजगद्दी निपटान की आदत भी तो थी - आज तो हम दस मिनट में एकदम तैयार हो गए... आज कितने दिनों बाद सुबह की चाय साथ पी... शाम को भी कोई कॉल कर ही नहीं पाया तो मैं कहीं फंसा ही नहीं सो शाम की चाय भी साथ पी... इस फोन के साथ न होने से पत्नीजी के चेहरे पर एक अजीब सी खुशी थी..  अरे इस फोन ने न जाने कितने लाखों करोड़ों पल हमसे छीन डाले इसका आभास सिर्फ एक दिन लैंडलाइन युग में जाने पर ही हो गया... 

बहरहाल शाम होते होते फोन ठीक किया गया... नया ऑपरेटिंग सिस्टम भी इंस्टॉल हो गया और हमारा गूगल पिक्सेल फिर से तैयार है लेकिन यह फोन ठीक होते ही कुछ तो फिर से खराब सा हो गया... 

----  न्यूयॉर्कर बिहारी की डायरी: आठ दिसंबर