गुरुवार, 22 अप्रैल 2010

मेरी मां

आज घर की बहुत याद आ रही थी, अम्मा का चेहरा रह रह कर आंखो के सामनें आ रहा था, ऐसा लग रहा था जैसे अम्मा मेरे सामनें आ जाती या मैं ही पर लगा कर अम्मा के पास चला जाता । एक पुरानी कविता है ना

सख्त रास्तों में भी आसान सफ़र लगता है...
यह मेरी मां की दुआओं का असर लगता है...
एक मुद्दत से मेरी मां नहीं सोई है...
मैंने इक बार कहा था, "मां, मुझे डर लगता है...



क्या लिखें, और क्या सुनाएं... शब्द आज कल टुट से गए लगते हैं... मानों मेरी कलम हंसना भूल कर किसी अवसाद में चली गई है । परदेस की चिडिया का दर्द भला किससे छुपा है, और फ़िर मां और मुल्क तो अपनें ही होते हैं । एक कविता मेरी मां के लिए... वैसे तो मैनें यह बहुत पहले लिखी थी... मगर आज यहां आपके सामनें रखनें का मन हो रहा है.... लीजिए पढिये...

जी करता है खूब रोऊं
दिल हल्का कर लूं
तेरे आंचल की छांव को छोड
परदेश में आ गया हूं
क्या करुं मां
अपनें भविष्य के लिए
तेरे भविष्य को छोड
परदेश में आ गया हूं
क्या करुं मां… क्या करुं
कहां तो तूनें मेरे लिए
अपना सब कुछ निसार किया
और कहां मैं एक क्रित्घ्न
तुझे छोड कर परदेश में आ गया
जी तो कर रहा है
तोड दूं सारे बन्धन
छोड दूं यह परदेश की सेवा
मगर क्या करूं मां
हौसला नहीं कर पा रहा हूं
तेरे आंचल की छांव को छोड
परदेश में आ गया हूं
क्या करुं मां… क्या करुं





-देव

4 टिप्‍पणियां:

Udan Tashtari ने कहा…

यही जीवन चक्र है...

क्या करियेगा.

दिलीप ने कहा…

maa se bichadne ka gham bada dardkarak hota hai...
http://dilkikalam-dileep.blogspot.com/

Bhagalpuri ने कहा…

bhai tu three ideat film ke khilari se kam nahi lagte ho,
me daily tumaharae kavita ko par kar tumaharai barae mai ??????????? karta hu

संजय भास्कर ने कहा…

हर रंग को आपने बहुत ही सुन्‍दर शब्‍दों में पिरोया है, बेहतरीन प्रस्‍तुति ।