बुधवार, 28 अप्रैल 2010

एक ज़रा सा दिल टूटा है... और तो कोई बात नहीं...

मंजिल की जिसको धुन हो उसे कारवा से क्या... आज ऐसे ही काम करते करते कान में यह धुन पड़ी... की कोई चले चले ना चले... हम तो चल दिए.... मंजिल की जिसको धुन हो उसे कारवा से क्या.... वैसे पंक्तियाँ तो अच्छी थी ही और फिर आज कल देव बाबा की मानो-वृत्ति पर एकदम सटीक बैठ भी रही थी..... दर-असल अकेले चलने का और अकेले ही अपनी मंजिल तय करने के बारे में सोचना जितना सरल है उतना सरल यह है नहीं | यह दुनिया जहाँ सभी अपने अपने हिस्से की ख़ुशी... अपने हिस्से का आसमान पाने के लिए ज़िन्दगी से जूझ रहे हैं उसमे फिर और किसी बात की गुंजाईश आखिर रह कहाँ जाती है | मगर फिर भी कुछ लोग आपके करीब आते हैं... और फिर वह आपकी ज़िन्दगी का हिस्सा बन जाते हैं... और फिर ज़िन्दगी जीना सरल होने लगता है... अपने अपने दुःख, खुशिओं और अपने मन के भावो के आदान प्रदान से जीवन कितना सुगम हो जाता है | दोस्ती यारी की ज़रूरत किसे नहीं होती है यार... मगर कहते हैं ना दोस्ती से पेट नहीं भरता.... और दोस्ती यारी की भी सीमाएं है यार.... दोस्ती यारी तभी तक निभ सकती है जब तक दो लोगों के आसमा आपस में नहीं टकराते.... जिस दिन दो लोगों के आसमान आपस में टकराए समझिये दोस्ती का अंत निश्चित...

एक ग़ज़ल पेश कर रहा हूँ आपकी खिजमत में.... पसंद आये और अगर ना भी आए तो भी..... झेलिये भाई... अभी कुछ नहीं हो सकता... देव बाबा के ब्लॉग पर आए हैं तो फिर कुछ ज्ञान तो मिलेगा ही....

तुम पूछो और मैं ना बताऊँ... ऐसे तो हालात नहीं
एक ज़रा सा दिल टूटा है... और तो कोई बात नहीं...

किसको खबर थी, साँवले बादल बिन बरसे उड़ जाते हैं..
सावन आया लेकिन अपनी... किस्मत में बरसात नहीं...

टूट गया जब दिल तो फिर साँसों का नगमा क्या माने..
गूंज रही है क्यों शहनाई.... जब कोई बारात नहीं...

मेरे गमगी होने पर एह्बाब है क्यों हैरान कतील
जैसे मैं पत्थर हूँ मेरे सीने में जज़्बात नहीं.....

-देव

4 टिप्‍पणियां:

वीनस केशरी ने कहा…

जनाब

आपकी पोस्ट पढ़ी और गजल भी कुछ बात मेरी समझ से पार हो गई इस लिए पूछ रहा हूँ

माना जीवन में औरत एक बार मोहब्बत करती है
लेकिन मुझको ये तो बता दे क्या तू औरत ज़ात नहीं

इस शेर को अपने क्यों छोड़ दिया जो बहुत उम्दा शेर है

और ये मिसरा कुछ यूं था
मेरे गम़गीं होने पर अहबाब हैं यों हैरान ‘क़तील’

आपने कतील साहब का नाम भी नहीं लिखा :)

देव कुमार झा ने कहा…

बहुत अच्छे.. वीनस भाई, आपनें पूरी कर दी रचना...

rajeevspoetry ने कहा…

कतील शिफाई साहब की यह ग़ज़ल काफी मशहूर है.
इसी ग़ज़ल का एक शेर यह भी है:

ख़त्म हुआ मेरा अफ़साना अब ये आँसू पोंछ भी लो
जिस में कोई तारा चमके आज की रात वो रात नहीं

Shekhar Kumawat ने कहा…

bahtrin bahut khub



badhia aap ko is ke liye

shkehar kumawat