बुधवार, 7 अप्रैल 2010

तेरी भी चुप मेरी भी चुप

तेरी भी चुप मेरी भी चुप

आज ना जाने क्यों, मगर मन हुआ की आज पीढ़ियों के दरम्यान आये वैचारिक गतिरोध और एक बड़े फासले के बारे में कुछ कहा जाए | यह समझिये यह झगडा एकदम मेला और शापिंग माल की तरह हो गया है... याद करिए गाँव का मेला... एक तरफ मस्त जलेबी बन रही है, रंग बिरंगे खिलौने, कोने में दुनिया दिखाता हुआ बाई-स्कोप.... झूले रंग बिरंगे गुब्बारे, पतंगे... नट का खेल... और भी ना जाने क्या क्या.... और आज कल का शापिंग माल... गाँव की जलेबी की जगह मैकडोनाल्ड का बर्गर, खिलौने की जगह कंप्यूटर गेम, बाई-स्कोप की जगह मल्टी-प्लेक्स और गुब्बारे तो भैया एकदम बदल गए हैं | अभी कुरता पैजामा वाला फैशन तो गया भैया, अभी तो हिंदुस्तान आई-टी के घोड़े पर सवार है, और तरक्की की नयी नयी कहानिया गढ़ रहा है | ना मालूम कौन कौन से कीर्तिमान रोज बन रहे हैं..... यार यहाँ एक राकेट अब दुनिया के दस दस सेटेलाईट ले जाता है, मगर ना जाने क्यों बूढ़े बुजुर्गों को आज भी सब कुछ साफ़ साफ़ क्यों नहीं दिखता... ?

अभी समाज की बुराइयों पर नज़र डालिए.... दहेज़, भर्ष्टाचार, कुशाशन, दुनिया भर में फैला आतंक-वाद, देश में पूरी तरह से फ़ैल चुका नक्सलवाद, राजनीति में चोरी चकारी..... यह सब भैया आज कल की पीढ़ी को विरासत में मिली हुई चीजे हैं....जिसके लिए उत्तर आने वाली पीढियां मांगेगी... | अब अगर आज कल के युवा से कोई यह कहता है की राजनीति में थोड़ी रूचि लो... थोडा देखो देश समाज को... तो यह मेरे हिसाब से बेमानी है... भैया क्या फर्क पड़ता है... राजा राम हो या रावण.... देश की जनता का हाल थोड़ी बदलने वाला है... सो यह भी आज कल की पीढ़ी को विरासत में देने के लिए आज कल की प्रौढ़ पीढ़ी ही ज़िम्मेदार है... |

अब आप बताइए... कहाँ गलत हुआ..............? आखिर दो पीढ़ियों के दरम्यान आये इस फासले को भरेगा कौन...

मुझे याद है एक बार मैं किसी क्लाइंट साहब से बात कर रहा था और वह शख्स सुनना ही नहीं चाहते थे, मैंने उनसे कहा की आपको समझा पाना मेरे लिए कठिन हो रहा है, आप अपने जूनियर को भेजिए, क्योंकि आप तो मैनेजर हैं आपको पता ही नहीं होगा की काम करना कैसे है, आप अपने बन्दे को भेजो मैं उसको यह समझाऊंगा की कैसे काम करना है, आप मैनेजर की तरह रहो आपका काम हो जायेगा..... शांति रखो.... मेरी इस बात पर वह पचपन साल के बुज़ुर्ग पिनक गए.... बोले देव साहब जभी xyz (उनके अन्दर कम करने वाला बंद) पैंट में सु सु करता था, तभी से मैं एक्साइज देख रहा हूँ.... मैंने भी उनको उत्तर दिया... प्रभु एक कोल्हू का बैल, कई साल तक कोल्हू के चारो ओर चक्कर काटेगा, मगर उसके बाद भी उसको यह पूछेंगे की कोल्हू का फंक्सन क्या है तो वह आपको उत्तर नहीं दे पायेगा.... सो आप इंसान की तरह व्यवहार करो और अपने बन्दे को भेजो.... आपकी समझ नहीं आएगा जो मैं आपको समझाना चाहता हूँ |

मैं नहीं कहूँगा मेरा व्यवहार एकदम सही था, मगर प्रत्युत्तर में शायद सच ही निकला... मुझे उस समय बहुत ताज्जुब होता है जब मैं सुनता हूँ की तुम अभी बच्चे हो और मुझे इस चीज का बीस साल का अनुभव है | और उस समय आपको मालूम हो की महाराज एकदम बेकार ही बात कर रहे हैं और बिना मतलब फिजूल में समय ख़राब कर रहे हैं...

दर-असल यह एक बानगी भर था.... जो कुछ भी मैंने ऊपर लिखा... वह शायद मन के अन्दर छुपी एक भावना थी... शायद ज़रूरत इस बात की है की कैसे अपनी धरोहर को बचाया जाये... और दोनों पीढ़ियों के बीच एक समन्वय बैठाया जाए | दोनों ही पीढियां अगर एक दुसरे की भावनाओ को समझने लगे और दोनों को अपनी अपनी ज़िम्मेदारी का अहसास हो जाये तो फिर कभी कोई बेटा अपने परिवार से दूर ना जाये... और अगर जाए तो भी मन से अपने परिवार.... अपने माता-पिता के पास रहे... देखते हैं क्या होता है...

देव

1 टिप्पणी:

संजय भास्कर ने कहा…

बढ़िया प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई.
ढेर सारी शुभकामनायें.

संजय कुमार
हरियाणा
http://sanjaybhaskar.blogspot.com