सोमवार, 5 अप्रैल 2010

देव बाबा की एक और कविता... चीलें...


चीलें...



चीलें तैयार हैं...
आसमान में उड़ते हुए..
धरती पर
किसी खरगोश को झपटने को
या किसी मरे हुए जानवर के
मांस को नोचने को
हत्यारी है वह..
मगर इंसान से तो बेहतर है..
कम से कम
उसके पंजे और नाखून
दिखाई तो देते हैं
दूर से उसके आने का
आभास तो देते हैं
जंगल में क्या
अब तो चीलें
इंसानी बस्ती में भी
आबाद हैं
क्योंकि इंसान की बस्ती में
चीलों का पेट आसानी से भर रहा है
क्योंकि यहाँ उसका काम
इंसान जो आसान कर रहा है...
सोचो असली हत्यारा कौन है....

3 टिप्‍पणियां:

R ने कहा…

Hi Dev, I came here to read your blog.. but i couldnt, as i dont know hindi.. i will use Google Trans and try to read.. Blog design is very beautiful.. Keep writting.. we will keep readingg... :)

संजय भास्कर ने कहा…

बढ़िया प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई.
ढेर सारी शुभकामनायें.

संजय कुमार
हरियाणा
http://sanjaybhaskar.blogspot.com
.

रवि कुमार, रावतभाटा ने कहा…

बेहतर....