सोमवार, 20 अगस्त 2012

एक गांव की खोज... :- देव

हर अब बसनें को है... कुछ गिने चुनें लोगों की जगह एक बडी आबादी बसनें को है... गांव की कच्ची सडक की जगह फ़ोर-लेन की रोड बन रही है.. बुलडोज़र अपना काम तेज़ी से कर रहे हैं... वहीं नामी गिरामी बिल्डरों की क्रेन बडी बडी बिल्डिंग बनानें का सामान पहुंचा रही हैं... कितनें ही ट्रक और कितनें ही मज़दूर काम में लगे हैं।  बुलडोज़र एक एक करके झोपडें गिराते जा रहे हैं... थोडा रुककर देखा तो लगा जैसे एक दुनियां उजड रही है, बुलडोज़र से टूटे घर की गॄहस्थी से जुडे सामान चूल्हा कुछ मिट्टी के बर्तन, डालडा के डब्बे और देवी देवता के कैलेण्डर नज़र आ रहे हैं... फ़टे पुरानें कुछ चीथडे भी हैं जो शायद इन झोपडों में रहनें वालों नें ही फ़ेंक रखे थे... बुलडोज़र पक्की इंटों की दीवार से बनें इस अवैध निर्माण को तोड कर ज़मीन समतल कर रहा है... और एक तेज़ आवाज़ से छत भी गिरकर धराशाई हो गई... अब घर पूरा टूट चुका है और एक पूरी दुनियां ज़मीदोज़ हो चुकी है। उस टूटे हुए घर के सामनें यह बुलडोज़र मानों भारत पर इंडिया की बादशाहत से इतरा कर एकदम घमंड में खडा है और वहीं बेचारा भारत ज़मीन पर टूटे फ़ूटे बर्तनों और फ़टे पुरानें कपडों से खुद को ढांकनें का प्रयास कर रहा है। बुलडोज़र ने फ़िर से वार किया और इस बार सब कुछ खत्म हो गया... कोई दस पन्द्रह मिनट के संघर्ष में पूरा घर मिट्टी में मिल गया और बुलडोज़र नें अपना काम खत्म किया... एक एक करके सारे झोपडें मिट्टी में मिला दिये गये और पूरी जमीन साफ़ हो गई... मतलब अब इस जगह पर एक टावर बिल्डिंग बननें का रास्ता खुल गया... मेरा मन उदास हो गया था और न जानें क्यों एकदम चुपचाप खडा मैं उस समतल जमीन पर एक अजीब सा उबड खाबडपन महसूस कर रहा था। 

इस जगह से इतर मैनें सडक पर नज़र डाली... रोड रोलर चल रहा था और गांव की सडक अब शहर की रोड में तबदील होनें को हैं... विकास यात्रा चल रही है और गांव शहर बननें की तरफ़ अग्रसर है। मैं सोच रहा था आखिर गांव के मूल निवासी जाते कहां हैं... मैनें वहां काम कर रहे मज़दूरों को पूछा की आखिर यहां के गांववाले कहां गये... उनमें से किसी नें कहा नहर के उस पार उन लोगों को बसाया जा रहा है... मन हुआ की चलो देखा जाये आखिर गांव गया कहां... कोई चार पांच किलोमीटर पैदल गए लेकिन नहर न दिखी... किसी को पूछा तो उसनें और दस किलोमीटर बोला, सोचा रिक्शा किया जाए या फ़िर वापस ही चला जाए...  जब तक हम इस उधेडबुन में थे तभी हमें रिक्शा मिल गया और हम रिक्शे में सवार होकर नहर की ओर चल दिए.. आधे घंटे के बाद एकदम कच्ची और टूटी फ़ूटी सडक से गुज़रते हुए नहर के पास पहुंचे और पाया गांव के नाम पर कुछ चंद टीन के घर बनें हुए थे.. शायद कुछ परिवार निवास करते होंगे... एक ने हमसे पूछा बाबू किससे मिलना है, अब कोई नाम होता तो न बताते... हम भी अचकचाते से बोले गांव यही है? उत्तर मिला हां...  आधुनिक भारत में गांव के ऐसे स्वरूप को देखकर कुछ और पूछनें की हिम्मत न हुई और हमनें वापस की राह ले ली। 

कमोबेश यही हाल हर उस गांव का है जो किसी बडे शहर के पास बसा है, या कहें की बसा था... शहर की ज़रूरत के मुताबिक गांवो को उजाड कर शहर की ज़रूरत को पूरा किया जा रहा है। 

गांधी जी कहते थे की भारत का अर्थ है साढे सात लाख गांव... लेकिन वह शायद इंडिया का अर्थ नहीं समझ पाए... आधुनिक भारत का सच यही है की इंडिया की ज़रूरत को पूरा करनें के लिए भारत पर बुलडोज़र चले और इसी पर विकास का माडल बनता रहे...  अजीब सी उधेडबुन में पडे हम घर वापस आए और भारी कदमों से सोसाईटी के अन्दर आए। लिफ़्ट का बटन दबाया और लिफ़्ट में प्रवेश किया... लिफ़्ट ऊपर आ रही थी और हमारा मन फ़िर से भारी हो रहा था.. शायद किसी गांव को उजाड कर ही इस बिल्डिंग का निर्माण हुआ होगा... कहां गये होंगे वह लोग.. कैसे हाल में होंगे वह लोग... कहां बसा होगा वह गांव..... 

:-देव

2 टिप्‍पणियां:

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

नगर यज्ञ में ग्राम बने आहुति,
सब मिटते जाते हैं।

देव कुमार झा ने कहा…

अजीब सी स्थिति है. .