रविवार, 8 जनवरी 2012

एक दिन सरकारी बस का सफ़र..... :-देव

लीजिये भाई.... आपने भी सरकारी बसों में यात्रा की (धक्के खाए) होगी और क्या बढ़िया मालिश का मजा फ्री में लिया होगा... बताओ दुनिया का कोई देश ऐसा होगा जो बस में मालिश की सुविधा देता होगा ? नहीं न.... तो फिर कहे गरियाते हो भाई... मौज लो न.... देव बाबा वैसे तो गाड़ी से नीचे नहीं उतरते हैं लेकिन वीक एंड में प्रयास रहता है की सरकारी माध्यमो का सहारा लिया जाये.... सो बस फिर क्या... देव बाबा को कल सुबह मुलुंड जाना था.... तो फिर हम सुबह सुबह बस स्टाप पहुँच गए...  यह लीजिये यह रहा बस स्टाप... 



बैठ के दिखाओ इसमें किसी भी सीट पर.... मुझे तो लगा था की यह सरकारी शौचालय के लिए बनवाया गया था.... किसी की गलती से बस स्टाप पर लग गया..... अबे इसको देख के जो हसी छुटा बता नहीं सकते भाई.....  हा हा बताओ.... चलो भाई कोई नहीं, सरकारी चीज ऐसे ही होता है....  


कोई आधे घंटे के बाद बस आई, बस शनिवार की सुबह बड़ी बुरी तरह से भरी हुई थी.... इस कदर भरी बस की मैंने कल्पना नहीं की थी.... किसी तरह से हम भी लटक लिए.... अन्दर जाने के लिए धीरे धीरे घुसना शुरू किया.... मान्यवर कंडक्टर साहब ने बोला टिकट... हम बोले मुलुंड.... बोला १२ रूपये.... हमने दिए २० रूपये... बोला दोन रूपये सुट्टे द्या....  हम बोले नहीं है.... बड़ी बुरी तरह से चिल्लाया.... हम झेंप गए.... हमारी हालत देख के कंडक्टर ने आठ रूपये हमारी तरफ बढ़ा दिए.... हम मन ही मन सोच रहे थे... की जब इसके पास छुट्टे थे तो फिर इसने ये बदतमीजी क्यों की... कोई नहीं... हम तो आम आदमी हैं.... गाली खाना सीखे हुए हैं... क्या फर्क पड़ता है....  कोई नहीं... हम धीरे धीरे आगे बढ़ते बढ़ते एकदम ड्राइवर के पीछे वाली खली जगह पर खड़े हो लिए.... कम से कम यहाँ हमारी मालिश नहीं हो रही थी....  

चित्र् गूगल से साभार...
मुंबई की बसों में आधी सीटे महिला आरक्षित, पांच सीटें अपंग, वृद्ध को लिए...  अब यार इसके बाद आम इंसान के लिए जगह बची ? अब देखिये पुरुष का ह्रदय कितना विशाल है.... जैसे ही कोई महिला देखी.... अपनी सीट छोड़ कर खड़ा हो जाता है.... और यह निष्ठुर महिला का ह्रदय....  वैसे यहाँ महिला आरक्षण का मुद्दा छिड़ गया तो फिर बवाल हो सकता है... इसलिए इस बात को यहीं छोड़ कर आगे रस्ते की और ध्यान देते हैं....  बस चालक.... अबे ये लोग बसों को गो-कार्टिंग स्टाइल में भगाते हैं..... जूम जूम.... एक लेन से दूसरी लेन.... ट्रक को ओवरटेक.... कभी लेफ्ट कभी राइट.... कभी हम इधर गिरते.... कभी उधर पड़ते.... 

मैं सोच रहा था, यार ऐसे गाड़ी चलाने की वजह क्या है.... बस स्टाप पर उतरा.... उतरा क्या जी.... फेकाया गया.... मतलब चलती बस से फेंक के उतरा.... कोई नहीं.... वापसी के समय भी कुछ ऐसा ही हुआ.....   क्या कहें....  सरकार और सरकारी बस की कुछ ऐसी ही हालत है भाई..... जय हो....

7 टिप्‍पणियां:

शिवम् मिश्रा ने कहा…

अबे वन पीस घर लौट आये यह क्या कम है ... साला जब देखो तुम्हारा शिकायत चालु रहता है ... बहुत बड़का अमेरिका से लौटा हुआ लाट साहब है ना तुम ... और यह क्या तुम बार बार 'आम' 'आम' करता है जी ... यह सब छोड़ दो नहीं तो 'सिब्बल - दिग्गी' की तरह का ख़ास ना बना दिए तो कहना !

रश्मि प्रभा... ने कहा…

बहुत मजेदार कुर्सी है .... ठीक बोले शिवम् भाई , शिकायत को मत उठाइये

देव कुमार झा ने कहा…

हा हा... शिवम भईया और रश्मि दीदी.... हमारा पेट दुखा रहा है हंसते हंसते..... खास के ई लाईन..."सिब्बल के जईसा खास"....

संजय भास्कर ने कहा…

सरकारी बस में सफ़र के मजे ही अलग है देव बाबु

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

हर जगह मानव की अधिकता और मानवता की कमी..

Vivek Rastogi ने कहा…

हम तो इसलिये शिकायत ही नहीं करते, जबकि रोज सरकारी बस में सफर करते हैंऑ

सदा ने कहा…

वाह ...बहुत बढिया।