शनिवार, 1 जनवरी 2011

बोले तो जय हिन्दुस्तान और जय इंसानियत.... ..... :-देव

मित्रों नये साल की शुभकामनाओं और मंगलकामनाओं के साथ देव बाबा का प्रणाम स्वीकारें, एक बडे अरसे के बाद ब्लाग जगत पर वापसी और वह भी नये साल के मौके पर भई वाह.

वैसे कहने और सुनानें को बहुत कुछ है मगर फ़िर भी कुछ नए साल का स्पेसल हो जाए तो फ़िर क्या बात हो... ठंड का मौसम... इस बार मुम्बई में भी पारा कोई १२ डिग्री तक चला गया है और मुम्बईया पब्लिक ठंड ठंड करती हुई शाल, मफ़्लर और ऊ नये स्टाईल वाला कनपट्टा पहिननें लगी है। कल हमारे सोसाईटी के सिक्योरिटी वाले तिवारी जी( बनारस के हैं) शाल मफ़लर लपेटे दिखे... हम पूछ दिये मालिक ई कौन स्टाइल हुआ बोले साहब, ठंडी लग रही है... हम बोले धुर्र ई कऊन बनारसी स्टाईल हुआ भाई... मजा इसलिए भी आया क्योंकि हम हाफ़ टी-शर्ट में घूम रहे थे....

अरे भाई बनारसी हैं... बनारस और बरेली का ठंडा झेले हैं तो मुम्बई का ठंडा भी कोई ठंडा लगेगा । बहरहाल हर जगह की बात अलग ही है... इसीलिए तो हमारा हिन्दुस्तान ज़िन्दा बाद है ना भाई....

कोस कोस पर बदले भाषा... कोस कोस पर बदले बानी.... हमरे हिन्दुस्तान की भैया यही निसानी यही निसानी....
(निसानी: शब्द जानबूझकर डाला गया है)

सो भैया नये साल पर यही दुआ है यही प्रार्थना है की

देश की अखंडता बनी रहे... विरोधियों का नाश हो... सब बुराईयां खत्म हों.. सच का बोलबाला रहे... और लोगों में विश्वास बढे....

बोले तो जय हिन्दुस्तान और जय इंसानियत....


जय हिन्द
देव कुमार झा

5 टिप्‍पणियां:

बी एस पाबला ने कहा…

देश की अखंडता बनी रहे... विरोधियों का नाश हो... सब बुराईयां खत्म हों.. सच का बोलबाला रहे... और लोगों में विश्वास बढे....

आमीन

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

आपकी आकांक्षायें सत्य हों।

संजय भास्कर ने कहा…

आपको और आपके परिवार को मेरी और से नव वर्ष की बहुत शुभकामनाये ......

राजकुमार ग्वालानी ने कहा…

गाजियाबाद से एक यलो एक्सप्रेस चल रही है जो आपके ब्लाग को चौपट कर सकती है, जरा सावधान रहे।

Priti Krishna ने कहा…

महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्‍वविद्यालय, वर्धा के ब्लॉग हिन्दी विश्‍व पर राजकिशोर के ३१ डिसेंबर के 'एक सार्थक दिन' शीर्षक के एक पोस्ट से ऐसा लगता है कि प्रीति सागर की छीनाल सस्कृति के तहत दलाली का ठेका राजकिशोर ने ही ले लिया है !बहुत ही स्तरहीन , घटिया और बाजारू स्तर की पोस्ट की भाषा देखिए ..."पुरुष और स्त्रियाँ खूब सज-धज कर आए थे- मानो यहां स्वयंवर प्रतियोगिता होने वाली ..."यह किसी अंतरराष्ट्रीय स्तर के विश्‍वविद्यालय के औपचारिक कार्यक्रम की रिपोर्टिंग ना होकर किसी छीनाल संस्कृति के तहत चलाए जाने वाले कोठे की भाषा लगती है ! क्या राजकिशोर की माँ भी जब सज कर किसी कार्यक्रम में जाती हैं तो किसी स्वयंवर के लिए राजकिशोर का कोई नया बाप खोजने के लिए जाती हैं !