मंगलवार, 3 अगस्त 2010

जय हिन्दुस्तानी रेल और जय रेल यात्री...

भैया अभी सप्ताहांत पर मुम्बई वापस आ रहा था... औरंगाबाद से मुम्बई आने के लिए तपोवन एक्सप्रेस पकड़ी और सेकेण्ड सीटिंग वाले डब्बे में देव बाबु ने अपना टिकट कटाया.... यकीन मानिए आज तक भोजपुरिया ट्रेनों में सफ़र करने के आदि देव बाबा का मराठी मानुषों से भारी हुई ट्रेन में सफ़र का पहला अनुभव था..... | और सच बताऊँ तो सफ़र ख़त्म होते होते एक बात जान गया... हिन्दुस्तानी हिन्दुस्तानी है... चाहे वह बिहारी हो... या मराठी हो.... हिन्दुस्तानी लोग भारतीय रेल की ऐसी तैसी करने में कहीं से भी पीछे नहीं है....| बोले तो यकीन नहीं आ रहा ? तो फिर ये देखो....




अब साहब देखिए ट्रेन के शौचालय का यह हाल है? बाकी डब्बे का हाल बयान नहीं कर सकता भाई। तीन वाली जगह पर चार/पांच सवार थे और बीच में दर्जनों लोग खडे थे। कुल मिलाकर ऐसी तैसी वाला माहौल था। देव बाबू की मरम्मत हो रही थी और किसी भी तरह से यह यात्रा सुख-दायक तो नहीं कही जा सकती थी।

बोले तो.... एक बात एकदम सही है.... कम से कम एक बात पर तो हिन्दुस्तान एक है...
जय रेल....
जय रेल के यात्री


-देव


13 टिप्‍पणियां:

E-Guru Rajeev ने कहा…

हा हा हा
बोरे पर ही शू-शू कर देना था.
सही बात कहीं किसी मामले में तो भारत के लोग एक हैं.
-----------------------------
च्च्च्च...
हे राम !
क्या कहें !
अरे शौचालय को तो छोड़ दिए होते ये लोग !

शिवम् मिश्रा ने कहा…

जय हो .....जय हो .......अनेकता में भी एकता ........जय हो .........जय हो !!

देव कुमार झा ने कहा…

बोले तो भारतीय रेल ज़िन्दाबाद.

Stuti Pandey ने कहा…

छी....थू......इंडिया में कैसे सब्जी खायेंगे :(:(:(

ललित शर्मा ने कहा…

देव बाबू-ये नीम के पत्ते दिख रहे हैं।
शायद संडास को कीटाणु रहित करने के लिए रखे हैं किसी समझदार ने:)

जय हिंद

इसे भी पढिए फ़ूंकनी चिमटा बिना यार-मुहब्बत है बेकार

शिवम् मिश्रा ने कहा…

एक बेहद उम्दा पोस्ट के लिए आपको बहुत बहुत बधाइयाँ और शुभकामनाएं !

आपकी पोस्ट की चर्चा ब्लाग4वार्ता पर है यहां भी आएं !

Pratul ने कहा…

दिखाए गए बोरों में नीम तले करेला होगा. कहते हैं करेले को नीम की पत्तियों से ढकने से करेले की फायदेमंद कडवाहट बरकरार रहती है. और उन्हें भक्षण पूर्व ही शौचालय से संसर्ग करवा दिया जाए तो वे पेट के लिये सुपाच्य बन जाते हैं. हमारे राष्ट्रकवि मिट्टीशरण गुप्त ने 'भागत-भागती' में शाक-सब्जियों की पीड़ा को कुछ यूँ व्यक्त किया है :
"हम कौन थे, क्या हो गए, और क्या होंगे अभी.
आओ मिलकर के शौचें, ये समस्याएँ सभी."

मैं तो कहूँगा :
सब्जियाँ खेत से मिलने आयीं अपने अवशेषों से.
मानवीय अवशिष्ट बनेगा खाद रूप में भोजन.
हराभरा शौचालय भैया हराभरा शौचालय.
इनको कैसे सफ़र करायें जब दूरी कई योजन.

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

देख तेरे इस रेल की हालत क्या हो गयी भगवान।

Vivek VK Jain ने कहा…

kya kahoo.....halat to har govt sector k yese hi h.

राम त्यागी ने कहा…

वैसे क्या बुरा है - हरा हरा है सब कुछ -:) - सुना होगा नारा - गो ग्रीन !!

संजय भास्कर ने कहा…

हे राम
भारतीय रेल ज़िन्दाबाद.

देव कुमार झा ने कहा…

@प्रतुल जी: गज्जब लिखा है.....

हराभरा शौचालय भैया हराभरा शौचालय.
इनको कैसे सफ़र करायें जब दूरी कई योजन

हरा भरा शौचालय....... ही ही

@स्तुति: अरे इत्ता मीन मेख ना निकालो.....

नीम की पत्ती.....


धन्य है भारतीय रेल।

भारत स्वाभिमान ट्र्स्ट राजनांदगांव ने कहा…

क्या बात है बहुत सुन्दर पढ़ कर अच्छा लगा