गुरुवार, 17 जून 2010

एक कवि सम्मेलन का अनुभव..... :-देव

यार आपको मालूम है की इस दुनियां में कवियों के भी प्रकार होते हैं.... जैसे भांति भांति प्रकार के मनुष्य वैसे ही भांति भांति प्रकार के कवि....

आप यह पूछ सकते हैं की कवियो को मनुष्यों की केटेगरी से अलग क्यों किया देव बाबा नें... तो भैया जो लोग कवि हैं वह तो इस बात का उत्तर समझ लेंगे... और जो कवि बननें की तरफ़ अग्रसर हैं उनको अभी थोडा टाईम लगेगा.... अभी बेमतलब की बकर बकर छोड कर सीधा मुद्दे पर ही आ जाता हूं ।

दर-असल कुछ दिन पहले एक कवि सम्मेलन में आनें का निमंत्रण मिला... यकीन मानिये वहां जानें के बाद ऐसा लगा की कोई चोर-दरवाजा नहीं है क्या जहां से भाग लें... या फ़िर अंतर्ध्यान हो जाएं... मगर ना चोर दरवाजा था और ना ही हमें अन्तर्ध्यान होनें की विद्या आती थी... (अंतर्ध्यांन होनें की विद्या आज कल के स्कूली शिक्षा का हिस्सा क्यों नहीं है, शिक्षा मंत्री ज़वाब दें.... ) अब साहब फ़ंस गये, और दिक्कत थी की बैठे भी उसी जगह थे जहां चारों तरफ़ हमसे भी बुज़ुर्ग लोग बैठे थे.... (हमसे भी बुज़ुर्ग पर गौर फ़रमाईए).

अब साहब किसी कवि का नाम नहीं लूंगा मैं तो बस मेरे अनुभव ही बाटूंगा.. इति कवि सम्मेलन गाथा प्रारम्भ.

सबसे पहले मंच पर आईं एक कवियित्री... जिन्होनें नारी उत्पीडन और नारी की दशा सुधारनें पर ना जानें कित्ता भारी प्रवचन दिया.... साहब तालियां थी की बजनें का नाम ही नहीं ले रही थी... सारे श्रोता तो व्यस्त थे अपने अपनें मोबाईल... बच्चे को संभालनें में....कुछ लोग पुरुष वर्ग में से अपनी पत्नी से नज़रे छुपाकर इधर उधर नज़रे ताज़ा करनें में व्यस्त था :).... कुल मिलाकर कवि सम्मेलन का एकदम आदर्श माहौल था भाई।

बहरहाल कवियित्री जी का काव्यपाठ पूरा हुआ और उनके प्रवचन के बाद नारी की स्थिति सुधरेगी यह कहकर उन्होनें अपनी बात खत्म की.... नारी की स्थिति एक कविता से सुधर जाएगी?

फ़िर एक एक करके सभी कवियों नें नारी उत्पीडन... नक्सली समस्या... पाकिस्तान.... भारतीय क्रिकेट की दशा और हां एक कोई पौनें चार फ़ुट के कवि थे उन्होने सबसे बहुत मेहनत कराई... मतलब उनकी कविताएं जबरदस्त भी भाई और उन्ही की कविताओं पर तालियां बजी बाकियों के लिए तो भैया सबने कुर्सियां थप थपा दी थी केवल। मगर ऊ पौनें चार फ़ुटिया था जबरदस्त.... एकदम पाकेट साईज बम... जो फ़ूटा तो ठहाकों और तालियों की गूंज से माहौल गजब का हो गया।

छोटे हैं मगर हैं गजब के.... वाह वाह...

अब साहब किसी प्रकार से समय खत्म हुआ और फ़िर उपसंहार करनें का समय आ रहा था.... माहौल में एक अजीब प्रकार का सन्नाटा था.... सभी लोग ध्यान लगा कर एक कवि की रचना समझनें का प्रयास कर रहे थे... (ससुरा बहुत उपर से जा रहा था)... कवि महोदय नें कहा की आपको यदि बीच में किसी उर्दु शब्द का मतलब समझ ना आए और कुछ भी दिक्कत पेश आए तो फ़िर मुझे टोक दीजियेगा और मुझसे पूछ लीजियेगा। एक छोटका सा बच्चा था उसको ना जानें का समझा.... ज़ोर से बोला "छु छु कहां कलूं" पूरा पंडाल गूज उठा.... ठहक्का हा हा. कवि महोदय गजब के हूट हो गये.... आगे ऐसी गलती नहीं करेंगे.... ।

बहरहाल कविता पाठ पूरा हुआ और कवि सम्मेलन अपने समापन की ओर बढा.... रात के बारह बजनें को थे और बारिश जोरो पे हो रही थी... घर जानें के लिए गाडी भगा रहे थे और सोच रहे थे की कैसे कैसे कुख्यात कुख्यात कवियों को सरकार नें खुला छोड रखा है.... बस कान से खून निकलनें ही वाला था भाई :)

चलो आज के बाद अब किसी कवि सम्मेलन में जाएंगे तो एग्ज़िट गेट के पास बैठेंगे... ताकि भागनें मे आसानी हो.... ;)

वैसे व्यंग्य पार्ट तो पूरा हुआ.... और अब असली बात की जाए.... दर-असल कवि सम्मेलन आज कल के ज़मानें में दीगर सी बात हो गयी सी लगती है, ना कोई टीवी कवरिंग करता है... और ना हीं असली श्रोता हैं। वैसे कवि सम्मेलन तो किसी भी विषय पर हो, उसमें रोचकता और श्रोताओं और मंच के बीच का तारतम्य बना रहना ही उसके प्राण हैं.... आशा है आप लोग अगली बार जब कवि सम्मेलन में जायेंगे तो फ़िर बच्चों को नियंत्रण में रखेंगे और मंच के कवियों की कविता ना सही तो उनके भाव समझनें का प्रयास करेंगे।

बस भाई जय राम जी की..... बाकी सब बढिया.... बेरोजगारी में इतना सब लिख मारे हैं....

डिस्क्लेमर: बन्धुओं यहां जो कुछ भी लिखा है उसको मेरा अनुभव माना जाए... किसी की भावनाएं आहत करनें का उद्देश्श्य नहीं है... बस एक सार्थक व्यंग्य प्रस्तुत करनें का प्रयास मात्र है।

-देव

5 टिप्‍पणियां:

निर्मला कपिला ने कहा…

्रोचक व्यंग आभार।

रंजना ने कहा…

हा हा हा हा .... रोचक मजेदार....
कान से खून निकालनेवाले कुछ ऐसे ही कवी सम्मेलनों का अनुभव दुर्भाग्यवश हमें भी हो चुका है...

मनोज कुमार ने कहा…

इसमें आपने अपनी पैनी निगाह ख़ूब दौड़ायी है। साधुवाद।

राम त्यागी ने कहा…

haha ...badiya raha ye bhi

E-Guru Rajeev ने कहा…

बहुत सही कान से खून निकाल देने वाली उपमा मजेदार है.
बेमतलब की बकर बकर छोड कर सीधा मुद्दे पर ही आ जाना सही लगा क्योंकि ऊपर से बस जाने ही वाला था और हम खिसका कर नीचे की ओर बढ़ने ही वाले थे पर आपने वहीं पर थाम लिया जी.
अभी ना जाओ छोड़कर....