सोमवार, 25 मई 2015

मोदी सरकार का एक साल: #Modi365

#Modi365 मोदी सरकार नें अपना एक वर्ष पूरा कर लिया है और ऐसे में कई चर्चाएं हो रही है कि इस सरकार नें क्या किया, क्या नहीं किया, क्या और अच्छा हो सकता था और क्या चूक हो गई। मैं एक अप्रवासी भारतीय के नज़रिए से पिछले एक वर्ष का अपना मत रख रहा हूं। 

मित्रों भारतीयों की स्मरण शक्ति बहुत कमज़ोर होती है और हम केवल सामनें का ही देखते हैं, ऐसे में पहले 2014 की स्थिति की एक झांकी देखना सबसे ज़रूरी हो जाता है। भारत की भौगोलिक स्थिति के बारे में क्या कहना, हमे विरासत में पाकिस्तान और चीन जैसे पडोसी मिले हैं जो सदैव भारत विरोधी गतिविधियों में सापेक्ष रूप से न सही लेकिन किसी न किसी रूप से लिप्त रहते ही हैं। बीते कई वर्षों में हमनें नेपाल, बांग्ला-देश, श्रीलंका जैसे देशों से भी सम्बन्ध बिगाडे हुए थे। देश उहापोह की स्थिति में था, हर रेटिंग एजेन्सी नें हमारी साख को नकारात्मक कर दिया था। मुद्रा भंडार की चिंताजनक स्थिति, कोई निवेश नहीं, उपर से आए दिन नये भ्रष्टाचार, वाकई विदेश में भारत की चिंताजनक स्थिति थी। मैं जब पिछले साल अमेरिका आया था तब लोग मजाक बनाते थे भारत की राजनीतिक स्थिति का। उस समय मेरे पास कोई शब्द न थे जिसके द्वारा मैं टाईम जैसे मैगज़ीन पर प्रधानमंत्री की "अंडर-अचीवर" की स्थिति को किसी भी प्रकार से जस्टीफ़ाई कर सकूं। दिन बदले, देश बदला, और आज ठीक एक साल बाद की स्थिति वास्तव में गौरव की गाथा है। यमन संकट में मोदी की कूटनीतिक सफ़लता का लोहा दुनियां नें माना, नेपाल भूकम्प में भारत के आपदा प्रबंधन नें दुनियां को हैरान किया। खुद नेपाल के प्रधानमंत्री मोदी के संदेश से भूकम्प की जानकारी लेते दिखे। पिछले साल, मोदी के लिए मेडिसन स्कवायर गार्डेन पार्क का सज जाना और किसी सुपर स्टार की तरह सभा को सम्बोधित करना यहां के अमरीकियों के लिए भी अचम्भे की बात थी। आज टाईम मैगज़ीन भारत के प्रधानमंत्री को अपने कवर पर फ़िर से स्थान देता है लेकिन इस बार यह उनकी यशगाथा लिए होता है, मेरे लिये भारत का इस स्थिति में आना बहुत बडे गौरव की बात है। 

इसके अलावा भी कई अन्य बातें जनता को जानना ज़रूरी है:

सरकारी तंत्र में सुधार: 
शायद कई लोग इस शब्द का अर्थ न जानें लेकिन एक छोटा सा मंत्र "मिनिमम गवरमेंट, मैक्सिमम गवरनेंस" बहुत प्रभावशाली सिद्ध हो रहा है। कांग्रेसी सरकारें, हमेशा से मुद्दे लटकानें के लिए जानी जाती रहीं है और ऐसे में मोदी का यह मंत्र उनका हाज़मा खराब करनें के लिए काफ़ी है। उदाहरण के लिए एक सडक पर यदि कोई पुल बनाया जाना है और बीच में रेल लाईन है। कुल मिलाकर तीन मंत्रालय इसमें आ गये, भूतल परिवहन, निर्माण और रेल। कांग्रेसी व्यवस्था में इसका कोई त्वरित हल नहीं निकलता और यह फ़ाईलों में कई वर्ष घूमता रहता। इस बीच भ्रष्ट तंत्र फ़लता फ़ूलता रहता और लोकल नेता से लेकर केन्द्र के मंत्री तक इसपर बहुत पैसा बना लेते। नई व्यवस्था में इस पारस्परिक सहयोग के लिए, नीति आयोग का गठन हो गया जो सीधे प्रधानमंत्री कार्यालय से नियंत्रित होगा। मतलब ऐसे मामले सीधे प्रधानमंत्री की निगरानी में होंगे और मोदी ऐसी किसी भी देरी को अपनें डैशबोर्ड पर सीधे देख कर कार्यवाही कर सकते हैं। ऐसा पहले कभी न हुआ लेकिन मंत्रालय आईटीआईएल के जिन मानकों पर चल रहा है, उसके बाद जल्द ही मोदी दुनियां की पहली आईएसओ प्रमाणित सरकार के मुखिया बन सकते हैं। इसकी सफ़लता का एक अन्य उदाहरण, कोयला और स्पेक्ट्रम आबंटन मे हुई पारदर्शिता भी है। यह अच्छे प्रशासक की निशानी थी जो रिपोर्ट कार्ड के रूप में वेब-साईट पर उपलब्ध किया गया। जो पैसा भ्रष्ट शासकों द्वारा लूट लिया जाता था वह अब देश के कल्याण में उपयोग हो रहा है। 

सरकारी बाबुओं का समय पर आफ़िस आनें लगना क्या कम बडी बात है? मेरे मित्र मुझे बताते हैं की "आरटीओ में एजेण्ट गायब हो गये और सब काम खुद ही लाईन में लग कर होता है, मदद करनें के लिए लोग आ गये हैं और आराम से काम बिना पैसा दिये हो गया, भीड थी लेकिन थे तो सब अपने ही जैसे लोग सो ठीक है" मेरे लिये यह भ्रष्टाचार मुक्त भारत की ओर बढनें वाला एक अच्छा कदम है। सरकार बिना जनता के सहयोग के नहीं चल सकती और यदि सरकार की नीयत साफ़ हो और उसे जन भागीदारी मिल जाए तो फ़िर ऐसे में क्रांतिकारी परिणाम देखनें को मिलते हैं।   

राष्ट्र निर्माण: 
कांग्रेस नें हमेशा सब्सिडी जैसी प्रक्रियाओं का समर्थन किया है, मेरे विचार से ऐसी कोई चीज होनी ही नहीं चाहिए। खाने पीने और दैनिक जीवन यापन के लिए प्रयोग में होनें वाली चीज़ें हर नागरिक को एक समान उसके खरीद की पहुंच के अन्दर होनी चाहिए। हर चीज़ के लिए तो टैक्स है, सर्विस टैक्स है, वैट है और हर जगह सरकारी लूट मची हुई है। मोदी सरकार इसपर कोई कठोर नीति बनानें की स्थिति में नहीं है और यह सम्भव भी नहीं है। लेकिन मोदी सरकार का एक छोटा सा आह्वान, "जिन्हे सब्सिडी नहीं चाहिए वह उसे छोड दें और राष्ट्र निर्माण में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करें" क्रांतिकारी अभियान सिद्ध हुआ। उन्होनें अभिजात्य वर्ग से सब्सिडी छोडनें का अनुरोध करके कुल बीस हज़ार करोड रुपए का भार कम किया है। राष्ट्र निर्माण के लिए ज्यादा से ज्यादा नौकरियां पैदा करने के लिए ईन्टरप्रीन्योरशिप पर ज़ोर दिया है जो आने वाले समय में बहुत बडा चमत्कारी बदलाव लायेगा। 

लालकिले से प्रधानमंत्री का यह कहना, कि समय से आफ़िस आना और अपना काम पूरी इमानदारी से करना भी एक देशभक्ति है। मुझे याद आता है कैसे शास्त्री जी के कहनें पर हरित क्रान्ति आई थी आज युवा क्रांति की आवश्यकता है और इसमें प्रधानमंत्री के इस प्रकार के आह्वान नवयुवक में ऊर्जा संचार करते हैं। राष्ट्र निर्माण में देश के हर वर्ग का योगदान चाहिए और मोदी इसमें काफ़ी हद तक सफ़ल हुए भी हैं। 

बचत को बढावा:
जनधन जैसी योजनाएं, देश के बैंकिंग तंत्र के लिए एक क्रांतिकारी कदम सिद्ध हुआ। कोई भी दिहाडी या घरेलू काम करनें वाला मेहनती मजदूर बैंक खाता रख सकता है।  इससे दो फ़ायदे हुए, पहला तो खाता खुलवाना बहुत आसान हुआ और दूसरा कि इसमें वह पैसा आया जो कभी किसी खाते में आ ही नहीं सकता था। इसके ज़रिए अढाई हज़ार करोड रुपये जमा हुए और वह पैसे राष्ट्र निर्माण में लगे। बारह रुपए में बीमा, इक्यासी रुपए में पेंशन जैसी योजनाएं किसी अन्य रूप में हमेशा से थीं लेकिन उनका कोई प्रचार होता ही नहीं था। मोदी राज में जनता के सबसे निचले तबके तक फ़ायदा पहुंचानें की नीयत साफ़ दीख रही है और यह एक बडा अन्तर है। 

काला धन:
मोदी सरकार नें अपने पहले सौ दिनों के कार्यक्रम में ही काला धन के प्रति अपनी संज़ीदगी दिखा दी थी लेकिन सच कहें तो इस मामले में बहुत कुछ हुआ नहींयह आज भी एक खुला मुद्दा है, और कांग्रेस से अलग भाजपा सिर्फ़ इसलिए दीख रही है क्योंकि उसके पास अभी इसको हल करनें के लिए चार साल हैं। यकीनन अभी तक इस दिशा में प्रयास हुए लेकिन वह नाकाफ़ी हैं। 

स्वच्छ भारत अभियान
सिर्फ़ आह्वान जिसनें आन्दोलन का रूप लिया, काशी के घाट इनका एक सजीव उदाहरण हैं। जो हमेशा गन्दगी के लिए जाना जाता रहा उसकी जगह साफ़ सुथरे घाट, आज घाट पर्यटन के लिए आदर्श स्थल सिद्ध हो रहे हैं। इस अभियान नें देश के साथ विदेशों में भी सुर्खिया बंटोरी। इससे ज्यादा बडी बात और क्या होगी कि लोगों नें कम से कम साफ़ सफ़ाई की बात की, और इसका सार्थक ही परिणाम निकला।

विदेश नीति और मेक-इन-ईंडिया: 
मुझे खुद भी इस आईडिया पर कोई भरोसा नहीं हो रहा था और कई प्रश्न थे, यह तो हमेशा से होता रहा है कि सरकारें अधिक से अधिक विदेशी कम्पनियों को लुभानें और भारत मे ज्यादा से ज्यादा काम लानें के लिए प्रयासरत रहीं लेकिन मोदी का यह अभियान कैसे फ़लेगा फ़ूलेगा? भारत में, मुख्यमंत्री के रूप में जिस तरह मोदी सभी औद्योगिक घरानों को गुजरात लानें में सफ़ल रहे, वही प्लान उन्होनें भारत के लिए अपनाया। इस मेक-इन-इंडिया का कैम्पेन भारत में अधिक से अधिक व्यापारिक घरानों को लाना है। मोदी नें इसे अपनी विदेश नीति का हिस्सा बनाया और अपनें पहले ही वर्ष में हर विदेशी दौरों मे समय निकालकर वहां बसे भारतीय समुदाय के लोगों से संवाद स्थापित किया। उनका भरोसा जीतकर उन्होनें हर देश के बडे औद्योगिक घरानों से मुलाकात की और उन्हे भारत को ब्रांड इंडिया के रूप में प्रस्तुत किया। मोदी के विदेश यात्राओं पर उंगली उठानें वालों के तर्क बेवकूफ़ी से भरे हुए हैं, प्रधानमंत्री को सूट-बूट, फ़्लाईट मोड और भी न जानें क्या क्या कहना उनकी हताशा मात्र है। मोदी की विदेश यात्राएं बहुत जरूरी हैं, पूर्ववर्ती सरकार द्वारा विरासत में मिली मुसीबतों का हल एक दिन में नहीं हो सकता लेकिन हर पडोसी से सम्बन्ध मधुर बनाए रखना मोदी नें अपनी प्रमुख प्राथमिकता  में रखा। चीन नें जिस प्रकार से नेपाल, बर्मा, भूटान, श्रीलंका, मालदीव पर डोरे डाले थे और पूरे हिन्द महासागर में अपनी सामरिक क्षमताएं मजबूत की हैं उसका एक बडा कारण कांग्रेसी विदेश नीति की असफ़लता भी थी। मनमोहन सरकार नें अपने किसी पडोसी पर ध्यान नहीं दिया और चीन ने इस स्थिति का बडा लाभ उठाया। मोदी ऐसी कोई गलती नहीं करना चाहते हैं और यह भारत के लिए अच्छा संकेत है। 

स्वाभिमान भारत:
पिछले दस वर्षों में भारत की क्षवि एक कमज़ोर देश की बनी हुई थी, ऐसे भी मौके आये थे जब दुश्मन हमारे देश में घुसकर सैनिकों के सर काट ले गये, पडोसी टहलने के बहानें हमारे देश में घुस आए। विदेशी मंचों पर भारत के प्रतिनिधि सिर्फ़ थके हुए उपस्थिति दिखाते प्रतीत हुए और मनमोहन सिर्फ़ लिखी लिखाई, रटी रटाई बाते करते दिखे। अब हर विदेशी दौरे में मोदी की उपस्थिति है, हर देश में मोदी का किसी सुपर स्टार की तरह स्वागत होता है। मोदी नें अंतराष्ट्रीय मंचों पर भारत को एक सीईओ की तरह प्रस्तुत किया और सही मायनें में नेतॄत्व करते दिखे, रटी रटाई बातों की जगह अब इंटैलेक्चुअल बातें होती दिखी। विश्व नें भारत की बातें सुनी, 21 जून को जब विश्व योग दिवस मनाएगा तब वह भी मोदी सरकार की एक सफ़लता के रूप में गिना जायेगा। पाकिस्तान, चीन और बांग्लादेश के सैनिक सीमा पर जब भी कोई हरकत करते पाए गये उन्हे उसका माकूल जवाब दिया गया। अमित शाह ने ठीक शब्द कहे, गोली आई तो गोला दिया, चीन भी समझ रहा है कि मोदी से उलझना उसके लिए फ़ायदे की बात नहीं। यह सब मोदी की सफ़लताएं कही जायेंगी।

मोदी का व्यक्तित्व पिछली सरकारों से उन्हे अलग करता है, वह "न खाऊंगा और न खानें दूंगा" का मंत्र कहते हैं, पारदर्शिता में विश्वास करते हैं, सरकारी खर्चों में कटौती और स्वाभिमान भारत की बात करते हैं, जनता से संवाद स्थापित करनें के लिए फ़ेसबूक और ट्विटर को स्वयं संचालित करते हैं। विश्व में सोशल मीडिया पर बराक ओबामा के बाद सबसे अधिक फ़ालोवर मोदी के ही हैं। यह बदलते भारत का सूचक है, यह आनें वाले कल के लिए सकारात्मक सोचनें का एक जज्बा देता है।  आने वाले चार वर्षों में मोदी के सामनें कई अन्य चुनौतियां हैं, जिसमें सबसे बडी ज़रूरत सार्थकता को बनाए रखते हुए बिना किसी अहं के कल्याणकारी योजनाओं पर ध्यान केन्द्रित किये रखनें की होगी। मंत्रियों की बयानबाज़ी और मीडिया की अनदेखी इन्हे नुकसान पहुंचा सकती है। मोदी या उनके मंत्री यदि अहंकारवश किसी प्रकार की बयानबाज़ी करते हैं तो यह विनाशकारी होगा, हमनें यूपीए-2 के मंत्रियों को देखा है और उनका अहंकार उनकी दुर्दशा के लिए बडा कारक सिद्ध हुआ। इस बात को मोदी समझते हैं और उम्मीद है कि वह सरकार और संगठन दोनों को ठीक प्रकार चलानें में सफ़ल होंगे।  दूसरी प्राथमिकताएं फ़िस्कल डेफ़िसिट को कम करनें और मुद्रास्फ़ीति को नियंत्रण में रखनें की होगी। वितरण प्रणाली का सरलीकरण उनकी अगली प्राथमिकताओं में होनी चाहिए। लोकपाल , महिला आरक्षण जैसे मुद्दे भी उन्हे हल करना है। 

अगले चार वर्षों के लिए मेरी शुभकामनाएं..... (यह एक स्वतंत्र आलेख हैं)

6 टिप्‍पणियां:

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

चार साल तक आपकी उसके बाद के सारे सालों के लिये हमारी शुभकामनाऐं ।

parmeshwari choudhary ने कहा…

Very good post.Positive and informative

गिरिजा कुलश्रेष्ठ ने कहा…

Aapki hr baat akaatya hai
Bas jaruri hai logon me imandari or dayittvabodh jage.

गिरिजा कुलश्रेष्ठ ने कहा…

Aapki hr baat akaatya hai
Bas jaruri hai logon me imandari or dayittvabodh jage.

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

स्थायी और चिर प्रभाव आने में समय और श्रम तो लगता है, गहन विश्लेषण।

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी ने कहा…

वाह, शानदार समीक्षा। विरोधियों को अब मान जाना चाहिए कि अच्छॆ दिन आने से कोई नहीं रोक सकता।