सोमवार, 17 मई 2010

अचार पराठा..... भाई वाह

दो दिन की दूरी ब्लोगिंग से और हाँ इन्टरनेट से... ससुरा बहुत भारी था यार... दिन भर की मेहनत ऑफिस से घर और हाँ घर से ओफ्फिस.... देव बाबा की बत्ती गुल हो गयी थी... आज शाम घर आया और इंटरनेट पर आया तो फिर जान में जान आई... अब ससुरा ब्लोगिंग ज़रूरत बन गया है... जब तक अपनी आप बीती दुनिया को सुना ना लो पेट नहीं भरता.. अभी आज कि शुरुआत में ही खुशदीप भाई की पोस्ट पढ़ डाली... भाई वाह... आज तो उन्होंने बड़े बड़े अंग्रेजों की ऐसी तैसी कर डाली यार... लिंक यह रही भाई मजा आ गया और हँसते हँसते पेट में दर्द हो गया.. यार खुशदीप भाई आपकी जय हो... बहुत खतरनाक किस्म का अनुभव लिखा आपने... वैसे मैं जब फ़्रांस यात्रा पर था तो अपने साथ लोटा ले कर गया था.. हिन्दुस्तानी आदमी को दिक्कत नहीं होनी चाहिए ना...

वैसे मेरा भी मन हुआ की आज कुछ खान पान की बात की जाये... मुझे याद है एक ज़माना पहले हमारे सक्सेना जी के घर से मिर्ची का अचार आया था.... साहब उसकी खुशबु ऐसी की कमबख्त दो मील दूर से ही मुंह से पानी आ जाये.... आप लोग लार मत टपकाईए, क्योंकि यह अचार किसी बम के गोले से काम ना था.... बस एक दिन की दावत और सक्सेना जी का अचार.... ज़िन्दगी भर नहीं भूलेगी कम्बखत वह दावत.... २५ दिसंबर का दिन था शायद १९९२ की बात है... सक्सेना जी के लड़के का जन्मदिन और न्यौता... बस फिर क्या भाई बिहारी आदमी को कोई न्यौता देगा तो फिर तो जाना ही है ना, गए और बस वह पहली और आखिरी दावत थी.. उसके सदमे से आज अठ्ठारह साल बाद भी उबार नहीं पाए हैं... बस तीन चार दिनों तक सुबह की परेशानी... सक्सेना जी के अचार के क्या कहने.... बस साहब खाने के बाद ही एहसास हुआ की शांति के दिनों में युद्ध कैसे लादे जाते हैं... बस इसी प्रकार के अचार बनाओ... और विरोधी के खेमे में बाँट दो.... ससुरा उसकी खुशबु को छोड़ के बाकी सब किसी बुरे सदमे से कम ना था....

वैसे सक्सेना जी के अचार के गोले के बाद देव बाबा ने कम से कम चार पांच सालों तक अचार का नाम ना लिया.... फिर अम्मा ने हमारी यह बात को समझ लिया और एक दिन हमें अपने साथ मिला कर अचार बनाने के लिए बैठ गयीं... साहब दूकान से अचार वाली लाल मिर्ची.... निम्बू.... हरी मिर्ची.... और हाँ कच्ची केरी (कच्चे आम) .... भैया सरसों को धूप दिखाई गयी... अम्मा ने लोढे सिल्बट्टे पर सरसों को एकदम बारीक पीसा.... आज कल का मिक्सर ना पीस पाए इतना बारीक... और फिर तमाम तरह के मसाले भाई वाह... देव बाबा ने अचार बनाने में अम्मा की मदद की और तब हमारी दोस्ती हुई अचार से... जैसे जैसे अचार बनता गया वैसे वैसे हमारा आनंद भी दुगना होता गया.... रोजाना जैसे ही धूप निकलती देव बाबा अचार की बरनी को बाहर रख आते.... बन्दर और कौवो से अचार को बचाते भी.... सरसों का तेल गरम करके आम के अचार को डूबा दिया गया... और यही कोई दस दिनों में अचार खाने के लायक हो गया.... भाई वाह.... अम्मा के हाथ में जादू.....

बस तब से लेकर आज तक... जब कभी भी भूख लगी हो देव बाबा का प्रिय भोजन.... गरमा गरम पराठे और एक मिर्ची (अम्मा की बनायीं हुई निम्बू और मिर्ची के अचार में से एक मिर्ची).... पूरी दुनिया एक तरफ और अचार पराठा एक तरफ....

लो भैया चित्र देख लो.... और बोलो... जय अचार...



-देव

9 टिप्‍पणियां:

प्रतुल कहानीवाला ने कहा…

आपकी प्रस्तुति मिटटी की महक और ग्रामीण संस्कृति की सुगंध लिए होती है. पढ़ कर बतरस का आनंद और चित्रात्मकता पूर्ण भाषा से आपकी प्रत्येक पोस्ट स्वादिस्ट हो जाती है.

हें भई ! खाने-पीने की बातें आपको बहुत पसंद हैं? या ये माता जी को याद करने का बहाना है? घर से दूर रहने के कारण घर में बिताये लम्हे आपके मानस में छाये रहते होंगे.

शिवम् मिश्रा ने कहा…

हम माना किये थे.................. माने नहीं..........अब अभी के अभी मेरे को भेजो यह पराठा और आचार !! बहुत तडपाये थे gtalk पर बता बता कर !!

वैसे तरीका बढ़िया लगा.............. बातो बातो में बता दिए कि फ़्रांस भी हो आये हो......बहुत चतुर हो देव बाबु !!

खुशदीप सहगल ने कहा…

यार देव बाबा,
अम्मा के आचार और पराठों की खुशबू यहां तक आ रही है...कहां खाने आऊं...हां, सक्सेना जी का सारा आचार अंग्रेज़ों को पार्सल करा दो...

जय हिंद...

राजेन्द्र मीणा ने कहा…

लेख पढ़ा , चित्र देखा और बोल दिया ...जय अचार .....अच्छी पोस्ट ...बहुत दिलचस्प इंसान हो .....

M VERMA ने कहा…

आधी अधूरी बात बताते हैं पराठे के साथ मक्खन भी तो रखा हुआ है
सुबह सुबह भूख लगवा दी

Udan Tashtari ने कहा…

गजब यार..हर पोस्ट को कब तक शानदार कहता रहूँ..अब पराठा अचार खिला ही दो. :)

honesty project democracy ने कहा…

भाई देव जी मान गए ,आपके इस पोस्ट से ज्यादा तो इस पोस्ट की थाली पर लोगों की और मेरी नजर जा रही है / वैसे पराठे के साथ अचार का मजा ही कुछ और है / आपसे एक आग्रह इस पोस्ट को पढ़िए और इंसानियत की हर संभव मदद कीजिये http://jantakifir.blogspot.com/2010/05/blog-post_17.html

Vivek Rastogi ने कहा…

अचार की महक और पराठों की खुश्बू हमें यहाँ तक खीच लाई है, जल्दी से खिलाया जाये भाई हमें भी.. :)

राम त्यागी ने कहा…

लोटा , फ्रांस और परांठे - फिर उसके साथ दही, अचार और माँ की बातें ...सब कुछ मजेदार रहा दोस्त ....एक original फील आता है तुम्हारी पोस्ट में .