सोमवार, 15 फ़रवरी 2010

वह दो मिनट.

दो मिनट कितने लम्बे और विद्रोह से भरे हो सकते हैं, यह आज हमने महसूस किया | दो मिनट का मौन हमारे एक सह-कर्मी की पुणे बम कांड में हुई हत्या के लिए था | वैसे तो वह दो मिनट केवल और केवल एक सौ बीस सेकेण्ड के बराबर ही थे, मगर पता नहीं आज वह एक सौ बीस सेकेण्ड एक सदी के समान लग रहे थे | किसी की मृत्यु हो जाये, या कोई दूर चला जाए दुःख होता है, मगर अनायास हुए मानवता के हत्यारों द्वारा हुई एक तेईस साल की मासूम की हत्या ने हमें झकजोर दिया था | मानो सोचने और समझने की सारी शक्ति ख़त्म हो चुकी थी, बुद्धि और विवेक अपना पता भूल चुके थे, मस्तिष्क में एक ही बात चल रही थी आखिर यह हो क्या रहा है | अपने ही देश में आखिर घूमना फिरना और दोस्तों के साथ बाहर जाना आखिर इतना खतरनाक है ? आखिर आतंकी चाहते क्या हैं ? क्या मनसूबे हैं उनके ?

आखिर हिंदुस्तान किस रस्ते पर चल निकला है ? क्या आतंक की इन वारदातों के पीछे केवल विदेशी हाथ हैं ? कतई नहीं बिना घर के विभिषनो के यह संभव नहीं | जब आतंकी पुणे में एक खौफनाक और दुह्साह्सी वारदात को अंजाम दे रहे थे, हमारी महाराष्ट्र की सरकार अपने पुरे दल और बल के साथ शाहरुख़ की फिल्म की सुरक्षा करने में व्यस्त थी | किसको दोष दें और किसको नहीं | गाँधी के देश में आज हर कोई अपनी मांग मनवाने के लिए हिंसा पर उतारू है... सरहदें बंट चुकी हैं मगर फिर भी आज़ादी के बासठ सालों के बाद भी हम अपने ही देश में सुरक्षित नहीं हैं | क्या करना है कैसे करना है........................ आखिर हम आम इंसान जो हैं..........

सरकारी तंत्र और सरकारी ख़ुफ़िया विभाग भले कोई भी रिपोर्ट दे, कोई भी जन पत्र निकाले देश से आतंक का सफाया नहीं हो सकता | देश में छुपे हुए दलालों का पता लगाना होगा..... हमारे देश में छुपे हुए पडोसी देश के दलालों और घर के भेदियों को खदेड़ना होगा | भारत जैसे देश में जिसकी आबादी सवा अरब हो.... क्या केवल बारह लाख सेना पर्याप्त है ? शायद सरहदों के लिए होगी, देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए नहीं | आंतरिक सुरक्षा तब मजबूत होगी जब देश का हर बच्चा देश का सैनिक बनेगा और अपने देश के लिए लड़ने और सजग रहने का प्रयत्न करेगा | यह कैसे संभव है ? आप पूछ सकते हैं | तो मैं आप ही लोगों से एक प्रश्न पूछता हूँ... क्या आप लोगों के साथ ऐसा कभी हुआ है की भारत और पाकिस्तान के बीच हुए क्रिकेट मैच में पाकिस्तान के जीतने या हारने पर कहीं ख़ुशी या गम मनाया गया हो ? पाकिस्तान से हो रहे आतंकी हमले कहीं ना कहीं हमारी ज़मीं पर हमारे ही लोगों के द्वारा या हमारे ही लोगों के द्वारा प्राप्त समर्थन के कारण हो रहे हैं | बिना यहाँ के लोगों की मदद से इतनी बड़ी वारदात को अंजाम देना असंभव है | उस दो मिनट के मौन ने मुझे यह सोचने पर मजबूर कर दिया की आखिर मेरा अपना योगदान कितना है..... शायद नगण्य | सोचना होगा की आखिर हम अपने देश के लिए क्या कर रहे हैं..............

एक दीप यात्रा करने और उसमे सभी फ़िल्मी सितारों के द्वारा फोटो खीचा करके कथित देश भक्ति साबित करें ? या फिर कोई फड़कता हुआ एक भाषण पढ़ दे ताकि मृत लोगों के परिजनों को सांत्वना मिल सके....? या फिर नेताओ की तरह गली गली घूम कर चंदा इकठ्ठा करें पीड़ित परिवारों को सहायता के लिए ? दरअसल हम आज भी सच्चाई की ओर पीठ करके खड़े हैं और चाहकर भी सच्चाई का सामना करने से डर रहे हैं | इनमे से कुछ भी करना या करने के लिए किसी को प्रेरित करना दूर दृष्टि से एक छलावा मात्र है | जबकि हमारी ज़िम्मेदारी एक सजग नागरिक बनकर देश में छुपे हुए भेदियों को निकल बाहर करने की होनी चाहिए.................. जब तक इस देश का एक एक बच्चा सजग नहीं होगा.... यह आतंक मचता रहेगा और हम केवल दो मिनट का मौन धारण करके अपनी श्रद्धांजलि देते रहेंगे....

सोचिये ...............

देव
फरवरी १५, २०१०

1 टिप्पणी:

रवि कुमार, रावतभाटा ने कहा…

कायल हुए प्रभु!!
आपके जज़्बे के आगे, और इसी कारण आपके आगे नतमस्तक हुए...

आप महान हैं...देवता हैं...
नारे लगा देते हैं...
हमारा नेता कैसा हो....देव बाबा जैसा हो...